MENTAL HEALTH IS VERY IMPORTANT : STUDENT

 आज सोशल मीडिया पर एक दुखद पोस्ट पढ़ी जिसमे एक गोल्ड मेडलिस्ट बच्चा सरकारी नोकरी के फैल्यर कि

 वजह से जिंदगी को छोड़ कर चला गया 

क्या सरकारी नोकरी इतनी जरूरी है : इसका जवाव है नहीं 

फिर बच्चों को एसे कदम क्यों उठाने पड़ रहे है 

आइए कुछ समाज कि हकीकत जानते है 

अगर आप के पास नोकरी है तब आप का सम्मान है बिना नोकरी आप कुछ नहीं हो , यह बात बहुत बार सुनने को मिलती है 
यह कोई ओर नहीं अपने आस पास के लोग हि बोलते है 

जो माता पिता किसी कारण वस खुद नोकरी नहीं लग पाते है वो अपने बच्चों को कहते है बीटा सम्मान के लिए नोकरी लग जा 

यह गलत भी नहीं है क्योंकि अपने बच्चों से सभी उम्मीद रखते है 

लेकिन जब उनकी उम्मीद समाज के अन्य लोगों के तानों के माध्यम से बाध्यता बन जाए तब बच्चे के लिए हानिकारक हो जाती है 

आप बोलोगे इसमे समाज के लोग क्या करे आज कि सच्चाई है 

मै इसको पूरी तरह नकारती हु 
समाज कि सच्चाई नहीं है 

समाज कि सच्चाई बनाई गई है ताकि कुछ लोगों के हित पूरे हो सके 

आप अनलाइन कोई भी एप खोलो देखो उस एक हि चीज दोहराई जाती है नोकरी लग जाने के बाद 60 साल कि जिंदगी आराम से गुजरेगी 

ठीक है जिंदगी आराम से गुजरेगी लेकिन क्या प्राइवेट मे नहीं गुजर सकती , चलो मान जो सिक्युरिटी नहीं है लेकिन क्या पता वो काम किसी कि मानसिक शांति हो 

ओर सरकारी नोकरी सिर दर्द 

सुनो ध्यान से लोगों को बोलेंगे कुछ साल जी लगाकर तैयारी कर लो फिर मोज है 

बच्चा अंधा धुन लग जाता है इसी बीच वह खुद को भूल जाता है ओर जब नोकरी नहीं लगता तब वह खुद को संभालना भी भूल जाता है 

माता पिता की जिम्मेदारी : बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए 

माता पिता को बच्चों पर उम्मीद थोपनी नहीं बल्कि बच्चे कि स्किल जाननी चाहिए 

आज कल माता पिता बस दूसरे के बच्चे को देख कर तुलना करते है ओर अपने बच्चे को कोसते है 

यह बिल्कुल भी सही नहीं है 

अगर भगवान को बच्चे को पड़ोसी के बच्चे जैसे गुण देने होते तो वह शक्ल भी उसकी जैसी ही देते 

लेकिन नहीं भगवान ने आप के बच्चे को आप की शक्ल दी है

इसका मतलब बच्चे में आप के गुण है

पड़ोसी के नहीं 
इसलिए बच्चे को अपने अनुसार बनाए ना की पड़ोसी के बच्चे के अनुसार

ना उसके साथ तुलना कीजिए ना उसको कोसीय 

बच्चा आप का है आप उसकी मानसिक स्थिति का ध्यान नहीं रखोगे तो फिर कौन ध्यान रखेगा

सरकारी नौकरी का इतना मानसिक दवाब कैसे ले लेता है एक इंटेलीजेंट बच्चा :- 
क्योंकि उसे बार बार कहा जाता है तुम तो सरकारी बाबू बन सकते हो

पुरानी मानसिकता की वजह से उसकी कीमत एक सरकारी नौकरी जितनी कर दी जाती है

बल्कि वह शायद के बड़ा बिजनेस मैन बन सकता हो

जो लाखों लोगों को रोजगार दे सकता हो

लेकिन नहीं इंटेलीजेंट मतलब सरकारी नौकरी लग जा

वहां पर आराम ही आराम 
यह कोई नहीं कहता आराम नहीं करना दिल से काम करना

इस वजह से बच्चा खुद को एक सरकारी नौकरी के जितना ही सक्षम समझ लेता है

वह इंटेलीजेंट होता है लेकिन शायद किसी कारण से वह एक्जाम पास नहीं कर पाता है तब उसे लगता है यह

 एग्जाम मेरे दिमाग से बड़ी नहीं हो सकती

ओर वह बार बार एग्जाम देता है लोगो के बारे में सोचता 
खुद ही इमेजिन कर लेता है कि बाहर जाऊंगा तब लोग कहेंगे लग गया का नौकरी


इससे ओवर्थिंग ओर अकेलापन बढ़ जाता है और धीरे धीरे परिवार और दोस्तों से कट जाता 

फिर खुद को अकेला समझ कर 
सोच लेता है दुनिया में मेरा कोई नहीं है

ओर गलत कदम उठा लेता है

क्या इस सिचुएशन से बाहर आने का रास्ता है 

हा इस सिचुएशन से बाहर आराम से आ सकते है 

आइए जानते है कैसे :- 
धीरे  धीरे खुद के माइंड को समझते जाओ मेरी समता अलग है इस नौकरी की डिमांड अलग है

इसके लिए मै खुद की समता को क्यों भूलू 

मै तो अपनी समताओ पर काम करूंगा

बस कुछ दिन पढ़ाई के साथ यह बोलते रहो

धीरे धीरे खुद को समझने लगोगे तब

पता चलेगा यह नौकरी इतने मायने नहीं रखती जितनी मेरी लाइफ मेरे लिए माइने रखती है

फिर अपनी काबिलियत पर भरोसा रख कर स्किल को सीखो

ओर खुद की आजीविका को कैसे चलाना है इसको mind मे क्लियर करो

सरकारी नौकरी आप के जीवन से ज्यादा कीमती नहीं है

शिक्षा कैसे बच्चों को मानसिक अवसाद से दूर कर सकती है

शिक्षा इसी होनी चाहिए जिससे बच्चे खुद का अस्तित्व पहचाने यह नहीं कि वह चार अक्षर शिक कर भेड़ चाल चले

शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए 

माता पिता पर निर्भर होकर जवानी बर्बाद करने वाला नहीं

स्कूल में स्किल पर ध्यान ज्यादा ओर कंपीटीशन एग्जाम पर ध्यान कम होना चाहिए

12th तक बच्चों को सिर्फ स्कूल में भेजो किसी कोचिंग में नहीं

ओर स्कूल में सिर्फ स्कूल का पाठ्यक्रम चलना चाहिए

किसी कंपीटीशन एग्जाम का नहीं

आज हम देखते है बड़ी बड़ी स्कूल कंपीटीशन पाठ्यक्रम चला कर माता पिता से अलग से फीस ले लेती है

माता पिता को समझना चाहिए कि एक उम्र तक बच्चे को स्कूली शिक्षा के दायरे में ही रखना चाहिए
क्योंकि कुछ चीजें उम्र के माध्यम से सीखी जाती है


इसलिए बच्चों पर बिना मतलब का बोझ नहीं बल्कि उनको आत्मनिर्भर होने का जरिया दो

मेरा सपना भारत में ऐसे स्कूल खोलना जहां पर बच्चों को मानसिक शांति मिले और आत्मनिर्भर होने का हुनर मिले , स्किल मिले 
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्कूल का वातावण अच्छा बनाया जाएगा

ओर स्किल दी जाएगी

अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर देना






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